001 नियमसार जी कारण शुद्धपर्याय जाम नगर 2011 यशस्वी आ० बा०ब्र० संध्या बहन जैन “दीदीश्री” (शिकोहाबाद)

शुद्ध निश्चय नियम का सच्चा स्वरूप – आत्मा के नित्य आनंद का अनुभव

जैन दर्शन के महान ग्रंथ नियमसार में आचार्य कुंदकुंदाचार्य ने शुद्ध निश्चय नियम का अत्यंत गहरा और आध्यात्मिक अर्थ बताया है। यहाँ नियम का मतलब केवल बाहरी व्रत, संकल्प या प्रतिज्ञा नहीं है, बल्कि अपने निज आत्मा की आराधना में निरंतर तत्पर रहना ही सच्चा नियम है। आत्मा का वास्तविक स्वरूप नित्य, शुद्ध, बुद्ध और आनंदमय है। जब साधक इस सत्य को जानकर उसी में स्थिर होता है, तभी वह शुद्ध निश्चय नियम का पालन करता है।

नियम क्या है?

सामान्य रूप से लोग नियम का अर्थ लेते हैं – “मैं यह करूंगा, यह नहीं करूंगा।” लेकिन शास्त्र कहते हैं कि सच्चा नियम है – निज आत्मा के नित्य आनंद में स्थित रहना। आत्मा का लक्षण ही नित्यानंद है। जब साधक अनुभव करता है कि “मैं ध्रुव, अखंड, आनंदमय आत्मा हूँ,” तब वह आत्मा की आराधना में तत्पर होता है। यही वास्तविक नियम है।

परम तत्व ज्ञानी और महातपोधन

जो आत्मा को आत्मा में धारण करता है, वही सच्चा तप करता है। यही अध्यात्म तप है और यही उसका धन है। इसलिए ऐसे ज्ञानी को “महातपोधन” कहा गया है। वह संचित सूक्ष्म कर्मों को जड़ से उखाड़ने में समर्थ होता है। वह केवल वाणी को रोकता ही नहीं, बल्कि मोह, राग, द्वेष जैसे सभी परभावों का भी त्याग करता है। क्योंकि वाणी और राग-द्वेष हमें पर से जोड़ते हैं, जबकि आत्मा का स्वरूप शुद्ध और निरपेक्ष है।

परभाव का त्याग क्यों आवश्यक है?

पुण्य-पाप, राग-द्वेष, मोह आदि सभी भाव परभाव हैं। ये आत्मा का स्वभाव नहीं हैं। जब साधक इन सबका निवारण करता है, तब वह अखंड और अद्वैत आत्मा में स्थित होता है। आत्मा की परिणति अनादि-अनंत, अखंड और एकरस है। उसमें खंड-खंड या द्वैत का कोई स्थान नहीं है।

आनंद का झरना – आत्मा का अनुभव

आत्मा को एक ऐसे पर्वत के समान बताया गया है, जिससे निरंतर आनंद का झरना बहता है। यह आनंद बाहरी सुख नहीं है, बल्कि आत्मा का स्वभाविक, शाश्वत और अमृतमय आनंद है। यह आनंद किसी कारण से उत्पन्न नहीं होता, बल्कि सदैव विद्यमान रहता है। जब साधक शुद्ध उपयोग (शुद्ध चैतन्य) के बल से आत्मा को देखता है, तब वह इसी आनंद में डूब जाता है।

आत्मा अनुपम और निरंजन है

आत्मा की किसी से तुलना नहीं की जा सकती। समझाने के लिए सिद्ध भगवान की उपमा दी जाती है, पर वास्तव में आत्मा अद्वितीय है। वह निरंजन है – अर्थात उसमें कर्म का लेप नहीं है। आत्मा त्रिकाल निरावरण, नित्य आनंदमय और शुद्ध है। यह स्वभाव पर्याय हर जीव में वर्तमान है।

शुद्ध उपयोग की साधना

शास्त्रों में बताया गया है कि परमार्थ से उपयोग सदा शुद्ध और निरंजन है। जब साधक इसी शुद्ध उपयोग के बल से आत्मा की संभावना (सम्यक भावना) करता है, तब वह शुद्ध निश्चय नियम में स्थित होता है। यह केवल विचार नहीं, बल्कि आत्मानुभूति की अवस्था है।

निष्कर्ष

शुद्ध निश्चय नियम का सार यही है कि हम अपने निज कारण परमात्मा स्वरूप में स्थित रहें। बाहरी आडंबर, वाणी या दिखावा नहीं, बल्कि भीतर की अखंड, अद्वैत और आनंदमयी आत्मा का अनुभव ही सच्चा नियम है।

जब हम समझ लेते हैं कि “मैं नित्य आनंदमय, ध्रुव और शुद्ध आत्मा हूँ,” तब जीवन में समता, शांति और परम सुख स्वतः प्रकट होने लगता है। यही जैन दर्शन का गूढ़ संदेश है – नियम का अर्थ है आत्मा की आराधना में निरंतर स्थित रहना।

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