003 नियमसार जी कारण शुद्ध पर्याय जाम नगर 2011 यशस्वी आ०बा०ब्र० संध्या बहन जैन “दीदीश्री” (शिकोहाबाद)

97वीं गाथा का गहरा रहस्य – “मैं सदा मुक्त कारण परमात्मा हूँ”

जैन आगमों में आत्मा के वास्तविक स्वरूप को समझाने के लिए अत्यंत गूढ़ और दिव्य वाणी दी गई है। विशेष रूप से नियमसार की 97वीं गाथा में आत्मा के “कारण परमात्मा” स्वरूप का अद्भुत वर्णन मिलता है। इस गाथा का मुख्य संदेश यह है कि आत्मा अपने शुद्ध स्वरूप में सदा मुक्त है। वह न तो कभी बंधती है और न ही वास्तव में दुखी होती है। बंधन और दुख तो केवल अज्ञान की दृष्टि से प्रतीत होते हैं।

निज भाव को कभी नहीं छोड़ता ज्ञानी

गाथा में कहा गया है कि सच्चा ज्ञानी अपने “निज भाव” अर्थात् अपने शुद्ध आत्मस्वरूप को कभी नहीं छोड़ता। वह परभाव—राग, द्वेष, मोह और संसार के संबंधों में नहीं फँसता। वह जानता है कि मैं शरीर, परिवार, धन या पद नहीं हूँ। ये सब बाहरी और अस्थायी हैं। मेरा असली स्वरूप तो शुद्ध ज्ञान, शुद्ध दर्शन और शुद्ध चरित्र है।

आत्मा और उसके स्वभाव धर्म

आत्मा के सहज ज्ञान, सहज दर्शन और सहज चरित्र—ये उसके स्वभाव धर्म हैं। जैसे द्रव्य बिना गुण के नहीं रह सकता और गुण बिना द्रव्य के नहीं रह सकते, वैसे ही आत्मा और उसके स्वभाव धर्मों का अटूट संबंध है। यह संबंध “आधार-आधेय” है, परंतु इसमें कोई विकल्प या कल्पना नहीं है। यह स्वाभाविक और अनादि है।

दुनिया में हम शरीर और संबंधों को अपना आधार मानते हैं—“ये न हों तो हम कैसे रहेंगे?”—यह मोह है। लेकिन आत्मा का सच्चा आधार तो उसका अपना शुद्ध स्वरूप है। यही निश्चय सम्यक दर्शन है।

कारण परमात्मा – मैं कौन हूँ?

गाथा का सार है—“मैं कारण परमात्मा हूँ।” कारण परमात्मा का अर्थ है वह आत्मा जो अपने शुद्ध, निरावरण, परम ज्ञान और परम दर्शन से स्वयं को जानती और देखती है। यह जानना इंद्रियों से नहीं होता, बल्कि सहज, निरावरण ज्ञान से होता है।

यहाँ एक सुंदर उपमा दी गई है—आत्मा और “सहज मुक्ति” का संबंध पति-पत्नी जैसा बताया गया है। इसका अर्थ भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक है। जैसे पति-पत्नी का अटूट संबंध होता है, वैसे ही आत्मा और मुक्ति का स्वाभाविक संबंध है। मुक्ति कोई बाहर से आने वाली वस्तु नहीं है; वह आत्मा का ही शुद्ध परिणमन है। मुक्त जीव और मुक्ति में कोई भेद नहीं है।

जिन सम्मत मुक्ति क्या है?

जिनेंद्र भगवान के अनुसार मुक्ति कोई भविष्य की घटना नहीं है कि “अभी बंधे हैं, बाद में मुक्त होंगे।” वास्तविकता में आत्मा अपने द्रव्य रूप से सदा मुक्त है। बंधन केवल पर्याय की दृष्टि से है। जब आत्मा अपने कारण स्वरूप को पहचान लेती है, तब कार्य मुक्ति प्रकट होती है।

इसलिए कहा गया है—“मुक्त जीव में मुक्ति और मुक्ति में मुक्त जीव—दोनों में कोई भेद नहीं।”

वास्तविक सुख कहाँ है?

संसार का सुख क्षणिक और दुख का कारण है। लेकिन आत्मा का सहज आनंद अनंत, निरंतर और शुद्ध है। यह आनंद किसी बाहरी वस्तु से नहीं मिलता, बल्कि अपने ही शुद्ध ज्ञान और दर्शन से मिलता है। यही वास्तविक सौख्य है।

सदा भावना कैसे करें?

सम्यक ज्ञानी को सदा यह भावना करनी चाहिए—

  • मैं सदा मुक्त हूँ।
  • मैं कारण परमात्मा हूँ।
  • मैं अपने सहज निरावरण परम ज्ञान से स्वयं को जानता हूँ।
  • मैं अपने सहज निरावरण परम दर्शन से स्वयं को देखता हूँ।

जब यह भावना दृढ़ हो जाती है, तब आत्मा का ध्यान बाहरी संबंधों से हटकर अपने शाश्वत स्वरूप में स्थिर हो जाता है। यही सच्चा अध्यात्म है।


निष्कर्ष

97वीं गाथा हमें सिखाती है कि हम वास्तव में बंधे हुए जीव नहीं, बल्कि सदा मुक्त कारण परमात्मा हैं। हमारा असली संबंध संसार से नहीं, बल्कि अपने शुद्ध ज्ञान-दर्शन स्वरूप से है। जब हम इस सत्य को पहचान लेते हैं, तब जीवन में शांति, स्थिरता और आत्मानंद का अनुभव होने लगता है।

इसलिए आज से यही भावना करें—
“मैं सदा मुक्त हूँ, मैं कारण परमात्मा हूँ।”

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top