008 नियमसार जी कारण शुद्ध पर्याय जाम नगर 2011 यशस्वी आ०बा०ब्र० संध्या बहन जैन “दीदीश्री” (शिकोहाबाद)

कारण परमात्मा और नित्यानंद का अनुभव: नियमसार की गहन व्याख्या

जैन दर्शन में आत्मा का स्वरूप, उसकी शुद्धता और नित्यानंद की अनुभूति का विषय अत्यंत गहरा और अनुभूतिपरक है। विशेष रूप से नियमसार में आत्मा को “कारण परमात्मा” के रूप में समझाया गया है। आचार्य कुंदकुंदाचार्य ने इस ग्रंथ में आत्मा की ऐसी दिव्य व्याख्या की है, जिसमें जीव को यह बताया गया है कि वह वास्तव में सदा मुक्त, सदा अंतर्मुख और सदा नित्यानंद को भोगने वाला है। यह शिक्षण केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष आत्मानुभव की दिशा में ले जाने वाला मार्ग है।

आत्मा का वास्तविक स्वरूप: सदा अंतर्मुख और अति अपूर्व

नियमसार में आत्मा को सदा “अंतर्मुख” बताया गया है। आत्मा कभी बहिर्मुख नहीं होती। बहिर्मुख तो केवल हमारी दृष्टि होती है, जो विषयों और परिणामों में उलझ जाती है। जब साधक समझता है कि “मैं आत्मा हूँ” तो यह सामान्य ज्ञान पर्याप्त नहीं है। उसे यह भी जानना होगा कि आत्मा कैसी है। आत्मा सदा अंतर्मुख स्वरूप वाली है, निरंजन है, निज बोध का स्थान है और अति अपूर्व है।

यह अति अपूर्वता इसलिए कही गई है क्योंकि अनादि काल से हमने अपने को देह, मन, भाव और परिस्थितियों से जोड़ा है, परंतु यह नहीं माना कि “मैं सदा अंतर्मुख चेतन तत्व हूँ।” जब यह दृष्टि बदलती है और साधक अपने भीतर स्थित शुद्ध आत्मा को पहचानता है, तब आत्मानुभव की प्रक्रिया प्रारंभ होती है। यही वास्तविक आत्मदर्शन है।

कारण परमात्मा की अवधारणा

जैन दर्शन में कारण परमात्मा और कार्य परमात्मा की चर्चा मिलती है। कार्य परमात्मा वह है जो सिद्ध अवस्था में है, और कारण परमात्मा वह है जो अभी संसार में है, परंतु स्वभाव से सिद्ध समान है। नियमसार के अनुसार प्रत्येक जीव कारण परमात्मा है। वह सदा मुक्त स्वरूप है, भले ही व्यवहार से बंधन दिखाई दे।

कारण परमात्मा का अर्थ है – वह आत्मा जो त्रिकाल परमानंद से भरी हुई है, जो सहज ज्ञान, सहज दर्शन और सहज चरित्र जैसे स्वभाव धर्मों से युक्त है। यहाँ आधार और आधेय का कोई विकल्प नहीं है, क्योंकि आत्मा अपने आप में ही पूर्ण है। वह स्वयं ही आधार है और स्वयं ही आधेय है। आत्मा को किसी बाहरी सहारे की आवश्यकता नहीं।

सहज मुक्ति और नित्यानंद का रहस्य

नियमसार में एक अत्यंत सुंदर उपमा दी गई है – आत्मा सदा मुक्त है और सहज मुक्ति रूपी स्त्री के संभोग से उत्पन्न होने वाले आनंद का स्थान है। इसका अर्थ लौकिक नहीं, बल्कि दार्शनिक है। यहाँ “सहज मुक्ति” आत्मा की स्वाभाविक मुक्त अवस्था का प्रतीक है, जो अनादि-अनंत से आत्मा के साथ है।

यह मुक्ति भविष्य में मिलने वाली कोई अवस्था नहीं, बल्कि वर्तमान में ही विद्यमान है। आत्मा त्रिकाल परमानंद से भरी हुई है। मोक्ष दशा में जो आनंद प्रकट होता है, वह कोई नया आनंद नहीं है, बल्कि उसी नित्यानंद का प्रकट रूप है जो अभी भी आत्मा में विद्यमान है। इसलिए कहा गया है कि मुक्त जीव सदा मुक्ति में ही वर्तता है और मुक्ति सदा मुक्त जीव में ही वर्तती है।

आत्मा का अविचल आवास

नियमसार में यह भी कहा गया है कि आत्मा अपने में ही अविचल रूप से स्थित है। यह संसार, देह, परिणाम – सब परिवर्तनशील हैं। ये किराए के घर की तरह हैं। परंतु आत्मा का वास्तविक घर उसके भीतर ही है। वही उसका स्थायी आवास है। आत्मा अपने में ही रहती है, अपने में ही आधार लेती है और अपने में ही आनंद का अनुभव करती है।

जब साधक यह अनुभव करता है कि “मैं मेरे में ही अविचल रूप से स्थित हूँ,” तब बाहरी परिस्थितियों का प्रभाव कम हो जाता है। यह स्थिरता ही आत्मिक शांति का आधार है। आत्मा का यह अविचल आवास अनादि-अनंत है, जिसमें कोई परिवर्तन नहीं होता।

त्रिकाल सहज ज्ञान और निरावरण दृष्टि

कारण परमात्मा को जानने और देखने का साधन भी आत्मा के भीतर ही है। नियमसार में स्पष्ट कहा गया है कि जो जीव निज निरावरण परम ज्ञान द्वारा अपने को जानता है और सहज अवलोकन द्वारा अपने को देखता है, वही कारण परमात्मा है। यहाँ ज्ञान और दर्शन कोई क्षणिक पर्याय नहीं, बल्कि त्रिकाल सहज ज्ञान और सहज दर्शन हैं।

जब साधक यह भावना करता है कि “मैं त्रिकाल सहज ज्ञान, सहज दर्शन और सहज चरित्र से युक्त हूँ,” तब उसकी दृष्टि स्थिर होती है। यह भावना ही वास्तविक चारित्र है। आत्मस्वरूप की निरंतर भावना करना ही नित्य प्रत्याख्यान है। यदि एक क्षण के लिए भी व्यवहार की मुख्यता हो जाए और स्वभाव की मुख्यता छूट जाए, तो वह मिथ्यात्व की दिशा है। इसलिए आत्मा की ध्रुवता को पकड़ना आवश्यक है।

नित्यानंद को भोगता हुआ ध्रुव आत्मा

नियमसार की गाथाओं में बार-बार यह भाव आता है कि आत्मा नित्यानंद को भोगता हुआ ध्रुव है। इसका अर्थ है कि आत्मा का स्वरूप ही आनंदमय है। वह दुख का भोगी नहीं है। दुख व्यवहार के स्तर पर दिखाई देता है, परंतु आत्मा के ध्रुव स्वरूप में केवल आनंद है।

जब साधक बार-बार यह भावना करता है – “मैं नित्यानंद को भोगता हुआ ध्रुव हूँ” – तब उसकी चेतना धीरे-धीरे उसी अनुभव में स्थिर होने लगती है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि आत्मा की वास्तविक स्थिति है। त्रिकाल से आत्मा आनंद चेतना को भोग रही है। वर्तमान क्षण में भी वही नित्यानंद विद्यमान है।

यह आनंद इंद्रिय से परे है, अतींद्रिय है। यह बाहरी विषयों से उत्पन्न नहीं होता। यह आत्मा की सहज शुद्ध ज्ञान चेतना का फल है। इसलिए कहा गया है कि आत्मा त्रिकाल आनंद चेतना को भोगती रहती है और वही आत्मा उपादेय है।

व्यवहार और निश्चय का समन्वय

जैन दर्शन में व्यवहार और निश्चय दोनों दृष्टियाँ बताई गई हैं। व्यवहार से बंधन और मोक्ष के भेद दिखाई देते हैं, परंतु निश्चय से आत्मा सदा मुक्त है। नियमसार का संदेश यह है कि निश्चय दृष्टि को पकड़ो। आत्मा में आधार-आधेय का भेद वास्तविक नहीं है। यह व्यवहार की दृष्टि है।

जब साधक त्रिकाली वस्तु की दृष्टि से आत्मा को देखता है, तब उसे अभेद आनंद का अनुभव होता है। वह जानता है कि कारण और कार्य की एकता भीतर सदा विद्यमान है। यही सम्यक दर्शन की शुरुआत है और यही आत्मिक शांति का मार्ग है।

निष्कर्ष: आत्मा ही नित्यानंद का स्रोत है

कारण परमात्मा का अर्थ है – वह आत्मा जो सदा मुक्त, सदा आनंदमय और सदा अंतर्मुख है। नियमसार हमें सिखाता है कि आत्मा को बाहरी उपलब्धियों में मत खोजो। अपने भीतर स्थित अविचल, निरंजन, आनंदमय स्वरूप को पहचानो। वही वास्तविक घर है, वही स्थायी शांति है।

जब साधक निरंतर यह भावना करता है कि “मैं नित्यानंद को भोगता हुआ ध्रुव आत्मा हूँ,” तब उसका जीवन बदलने लगता है। भय, अस्थिरता और दुख का प्रभाव घटने लगता है। आत्मा की यह पहचान ही मोक्ष मार्ग का वास्तविक आरंभ है।

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